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आँख तरेर कर, जब बेलन दिखलाय,
अंडा-डंडा गिर पड़ें, घर ठंडा हो जाय।

अपनी गलती नहिं दिखे, समझे खुद को ठीक,
मोटे-मोटे झूठ को, पीस रहा बारीक।

अपनी ही करता रहे, सुने न दूजे तर्क,
सभी तर्क हों व्यर्थ जब, मूरख करे कुतर्क|

एकता / अनिल धमाका

एकता / अनिल धमाका


हमने पूछा-
‘अनेकता में एकता’
आप नारा लगाते हैं,
कृपया बताएँ इसके क्रियान्वयन-हेतु
आपने अब तक क्या किया ?’
वे बोले-
‘अभी तो इसके प्रथम चरण से गुज़र रहे हैं,
सर्वप्रथम अनेकता लाने का
प्रयास कर रहे हैं।

अंबर कब था / डा.अजय चौधरी

अंबर कब था / डा.अजय चौधरी



अपने ग़म से हटकर कब था
वो इन्साँ पैग़ंबर कब था
जिसके बूढ़े सर पर पत्थर
बचपन उसका पत्थर कब था
कातिल की आँखों में रहता
रोती माँ का मंज़र कब था
प्यास समझता क्या औरों की
प्यासा रहा समंदर कब था
रोज बनानी थी छत उसको
उसके सर पर अंबर कब था