कलयुगी द्रौपदी




कलयुगी द्रौपदी - काका हाथरसी



काकी से की प्रार्थना, नवा-नवाकर शीश,
प्रिये, हमें दे दीजिए रुपे चार सौ बीस।
रूपे चार सौ बीस, आज जूआ खेलेंगे,
यह संख्या बलवान, शर्तिया हम जीतेंगे।
लगा दिए वे रुपये, एक दाव पर सारे,
दुगुने आए लौट, हौसले बढ़े हमारे।
साहस आगे बढ़ा, दाँव-पर-दाँव लगाए,
हार गए सब, घर आए मुँह को लटकाए।

काकी बोलीं- क्या हुआ, कैसे बीती रात,
कितने आए जीतकर, सच-सच बोलो बात ?
सच-सच बोलो बात, सुनाया संकट उनको,
जीत भाड़ में गई, हार बैठे हम तुमको।
सुनकर देवी जी ने मारा एक ठहाका,
मुझे द्रौपदी समझा है क्या तुमने काका ?
घबराओ मत चिंता छोड़ो, पीओ-खाओ
जीत गए जो कौरव, उनके पते बताओ !

तन-मन व्याकुल हो रहा, क्या होगा रघुनाथ,
लेकर बेलन हाथ में, चलीं हमारे साथ।
चलीं हमारे साथ, देख बूढ़ी रणचंडी,
कौरव-दल की सारी जीत हो गई ठंडी।
दु:शासन जी बोले, क्षमा कीजिए हमको,
यह कलयुगी द्रौपदी, रहे मुबारक तुमको।
काकी बोलीं-यों नहिं पीछा छोड़ूँ भइए,
लौटाओ सब इनसे जीते हुए रुपइए।

संगीन नेता : रंगीन दोहे

संगीन नेता : रंगीन दोहे _ काका हाथरसी



चहुँदिशि उड़ें विमान में, इंकापति राजीव,
अगले आम चुनाव की, जमा रहे हैं नींव।
जिताएँ समाज सेवी, व्यर्थ निकली श्रीदेवी !

करुणानिधि का करुणरस, बदल बन गया हास,
तमिलनाडु में शेष रस, रक्खे अपने पास।
करेंगे नवरस पूरे, न समझो स्वप्न अधूरे !

चंडी चुरहट लाटरी, चाट गई सब खीर,
फड़क रहे गांडीव में, अर्जुनसिंह के तीर।
खोट करते हैं पुत्तर, बापजी क्यों दें उत्तर ?

धीरे-धीरे लग रही, वी.पी.सिंह की हाट,
कब प्रधानमंत्री बनें, देख रहे हैं बाट।
घोषणा कर डाली है, विकल्प जनता-दल ही है !

कहें चंद्रशेखर, रहें सत्ता से हम दूर,
जनता-दल की बेल के, खट्टे हैं अंगूर।
सिंह जी भरकम भारी, दाल नहिं गले हमारी !

कमलापति राजीव को, चिट्ठी लिखते रोज,
पट्ठे उनके कर रहे, पोस्टमैन की खोज।
नहीं कुछ उत्तर आता, बुढ़ापा बढ़ता जाता !

भजनलाल के भजन से, बजें भवन में ढोल
बेटा देवीलाल के, खोल रहे हैं पोल।
वित्त विवरण नहिं देंगे, विरोधी क्या कर लेंगे !

भगत सरीखा जगत में, कौन मिलेगा व्यक्ति,
दिल्ली की किल्ली हिले, दिखलाए जब शक्ति।
दंडवत करते लाला, देखकर चश्मा काला !

बूटासिंह के बूट पर, मक्खन मलिए आप,
कष्ट दूर हो जाएँगे, नष्ट होएँ सब पाप।
कृपा जिसने पाई जी, बन गए डी.आई.जी. !

दिल्ली में रैली हुई, पीड़ित हुए किसान,
टिक नहिं सके टिकैत जी, फ़ेल हो गया प्लान।
दिखाते रहते मुक्का, सामने रखकर हुक्का !

अटलबिहारी अनमने, एकल करें निवास,
अब इनको डाले नहीं, कोई सुमुखी घास।
प्रगति गति ढुलमुल-सी है, भाजपा व्याकुल-सी है !