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काका दोहावली


काका दोहावली _काका हाथरसी

मेरी भाव बाधा हरो, पूज्य बिहारीलाल

दोहा बनकर सामने, दर्शन दो तत्काल।

अँग्रेजी से प्यार है, हिंदी से परहेज,
ऊपर से हैं इंडियन, भीतर से अँगरेज।

अँखियाँ मादक रस-भरी, गज़ब गुलाबी होंठ,
ऐसी तिय अति प्रिय लगे, ज्यों दावत में सोंठ।

अंतरपट में खोजिए, छिपा हुआ है खोट,
मिल जाएगी आपको, बिल्कुल सत्य रिपोट।

अंदर काला हृदय है, ऊपर गोरा मुक्ख,
ऐसे लोगों को मिले, परनिंदा में सुक्ख।

अंधकार में फेंक दी, इच्छा तोड़-मरोड़
निष्कामी काका बने, कामकाज को छोड़।

अंध धर्म विश्वास में, फँस जाता इंसान,
निर्दोषों को मारकर, बन जाता हैवान।

अंधा प्रेमी अक्ल से, काम नहीं कुछ लेय,
प्रेम-नशे में गधी भी, परी दिखाई देय।

अक्लमंद से कह रहे, मिस्टर मूर्खानंद,
देश-धर्म में क्या धरा, पैसे में आनंद।

अगर चुनावी वायदे, पूर्ण करे सरकार,
इंतज़ार के मज़े सब, हो जाएँ बेकार।

अगर फूल के साथ में, लगे न होते शूल,
बिना बात ही छेड़ते, उनको नामाकूल।

अगर मिले दुर्भाग्य से, भौंदू पति बेमेल,
पत्नी का कर्त्तव्य है, डाले नाक नकेल।

अगर ले लिया कर्ज कुछ, क्या है इसमें हर्ज़,
यदि पहचानोगे उसे, माँगे पिछला क़र्ज़।

अग्नि निकलती रगड़ से, जानत हैं सब कोय,
दिल टकराए, इश्क की बिजली पैदा होय।

अच्छी लगती दूर से मटकाती जब नैन,
बाँहों में आ जाए तब बोले कड़वे बैन।

अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम,
चाचा मेरे कह गए, कर बेटा आराम।

अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम,
भाग्यवाद का स्वाद ले, धंधा काम हराम।

अति की बुरी कुरूपता, अति का भला न रूप,
अति का भला न बरसना अति भली न धूप।

अति की भली न दुश्मनी, अति का भला न प्यार
तू तू मैं मैं जब हुई प्यार हुआ बेकार।

अति की भली न बेरुखी, अति का भला न प्यार
अति की भली न मिठाई, अति का भला न खार।

अति की वर्षा भी बुरी, अति की भली न धूप,
अति की बुरी कूरुपता, अति का भला न रूप।

अधिक समय तक चल नहीं, सकता वह व्यापार,
जिसमें साझीदार हों, लल्लू-पंजू यार।

अधिकारी के आप तब, बन सकते प्रिय पात्र
काम छोड़ नित नियम से, पढ़िए, चमचा-शास्त्र।

अपना स्वारथ साधकर, जनता को दे कष्ट,
भ्रष्ट आचरण करे जो वह नेता हो भ्रष्ट।

अपनी आँख तरेर कर, जब बेलन दिखलाय,
अंडा-डंडा गिर पड़ें, घर ठंडा हो जाय।

अपनी गलती नहिं दिखे, समझे खुद को ठीक,
मोटे-मोटे झूठ को, पीस रहा बारीक।

अपनी ही करता रहे, सुने न दूजे तर्क, सभी तर्क हों व्यर्थ जब, मूरख करे कुतर्क|

पैदावार / अनिल धमाका

पैदावार / अनिल धमाका



हमसे पूछा गया ‘किन्हीं दो फ़सलों के नाम बताएँ
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद लगातार बढ़ रही हो जिनकी पैदावार।
’
हमने कहा-‘भ्रष्टाचार व आतंकवाद।’

मँहगाई



मँहगाई _ काका हाथरसी



जन - गण - मन के देवता , अब तो आँखें खोल

महँगाई से हो गया , जीवन डाँवाडोल

जीवन डाँवाडोल , ख़बर लो शीघ्र कृपालू

कलाकंद के भाव बिक रहे बैंगन - आलू

कहँ ‘ काका ' कवि , दूध - दही को तरसे बच्चे

आठ रुपये के किलो टमाटर , वह भी कच्चे


राशन की दुकान पर , देख भयंकर भीर

‘ क्यू ’ में धक्का मारकर , पहुँच गये बलवीर

पहुँच गये बलवीर , ले लिया नंबर पहिला

खड़े रह गये निर्बल , बू ढ़े , बच्चे , महिला

कहँ ‘ काका ' कवि , करके बंद धरम का काँटा

लाला बोले - भागो , खत्म हो गया आटा

चंद्रयात्रा और नेता का धंधा


चंद्रयात्रा और नेता का धंधा _ काका हाथरसी


ठाकुर ठर्रा सिंह से बोले आलमगीर

पहुँच गये वो चाँद पर, मार लिया क्या तीर?

मार लिया क्या तीर, लौट पृथ्वी पर आये

किये करोड़ों ख़र्च, कंकड़ी मिट्टी लाये

'काका', इससे लाख गुना अच्छा नेता का धंधा

बिना चाँद पर चढ़े, हजम कर जाता चंदा

दाता एक राम / अल्हड़ बीकानेरी

दाता एक राम / अल्हड़ बीकानेरी


साधू, संत, फकीर, औलिया, दानवीर, भिखमंगे
दो रोटी के लिए रात-दिन नाचें होकर नंगे

घाट-घाट घूमे, निहारी सारी दुनिया
दाता एक राम, भिखारी सारी दुनिया !

राजा, रंक, सेठ, संन्यासी, बूढ़े और नवासे
सब कुर्सी के लिए फेंकते उल्टे-सीधे पासे

द्रौपदी अकेली, जुआरी सारी दुनिया
दाता एक राम, भिखारी सारी दुनिया !

कहीं न बुझती प्यास प्यार की, प्राण कंठ में अटके
घर की गोरी क्लब में नाचे, पिया सड़क पर भटके

शादीशुदा होके, कुँआरी सारी दुनिया
दाता एक राम, भिखारी सारी दुनिया !

पंचतत्व की बीन सुरीली, मनवा एक सँपेरा
जब टेरा, पापी मनवा ने, राग स्वार्थ का टेरा

संबंधी हैं साँप, पिटारी सारी दुनिया
दाता एक राम, भिखारी सारी दुनिया !

झूठ / अनिल धमाका

झूठ / अनिल धमाका


मंत्री जी से पूछा गया- ‘अपने जीवन का कोई महत्त्वपूर्ण झूठ बताइये’
वो बोले- ‘मेरे भाषणों की प्रतियाँ ले जाइए।’

काका के हँसगुल्ल


काका के हँसगुल्ल _ काका हाथरसी

अंग-अंग फड़कन लगे, देखा ‘रंग-तरंग’
स्वस्थ-मस्त दर्शक हुए, तन-मन उठी उमंग
तन-मन उठी उमंग, अधूरी रही पिपासा
बंद सीरियल किया, नहीं थी ऐसी आशा
हास्य-व्यंग्य के रसिक समर्थक कहाँ खो गए
मुँह पर लागी सील, बंद कहकहे हो गए

जिन मनहूसों को नहीं आती हँसी

पसंद हुए उन्हीं की कृपा से,

हास्य-सीरियल बंद हास्य-सीरियल बंद,

लोकप्रिय थे यह ऐसे श्री रामायण और महाभारत थे

जैसे भूल जाउ, लड्डू पेड़ा चमचम रसगुल्ले

अब टी.वी.पर आएँ काका के हँसगुल्ले

व्यंग्य एक नश्तर

व्यंग्य एक नश्तर _ काका हाथरसी

व्यंग्य एक नश्तर है ऐसा नश्तर,
जो समाज के सड़े-गले अंगों की
शल्यक्रिया करता है
और उसे फिर से स्वस्थ बनाने में सहयोग भी।

काका हाथरसी यदि सरल हास्यकवि हैं

तो उन्होंने व्यंग्य के तीखे बाण भी चलाए हैं।
उनकी कलम का कमाल कार से बेकार तक
शिष्टाचार से भ्रष्टाचार तक

विद्वान से गँवार तक
फ़ैशन से राशन तक
परिवार से नियोजन तक

रिश्वत से त्याग तक
और कमाई से महँगाई तक
सर्वत्र देखने को मिलता है।

अनुशासनहीनता और भ्रष्टाचार

अनुशासनहीनता और भ्रष्टाचार _काकाहाथरसी

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बिना टिकट के ट्रेन में चले पुत्र बलवीर

जहाँ ‘मूड’ आया वहीं, खींच लई ज़ंजीर

खींच लई ज़ंजीर, बने गुंडों के नक्कू

पकड़ें टी. टी. गार्ड, उन्हें दिखलाते चक्कू

गुंडागर्दी, भ्रष्टाचार बढ़ा दिन-दूना

प्रजातंत्र की स्वतंत्रता का देख नमूना

मुर्ग़ी और नेता


मुर्ग़ी और नेता _ काकाहाथरसी

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नेता अखरोट से बोले किसमिस लाल

हुज़ूर हल कीजिये मेरा एक सवाल

मेरा एक सवाल, समझ में बात न भरती

मुर्ग़ी अंडे के ऊपर क्यों बैठा करती

नेता ने कहा, प्रबंध शीघ्र ही करवा देंगे

मुर्ग़ी के कमरे में एक कुर्सी डलवा देंगे